लकड़ियां भरकर जलाया गया था कश्मीर के मार्तंड मंदिर को
देश में मुख्य रूप से चार सूर्य मंदिर हैं। पहला, ओडिशा स्थित कोणार्क। दूसरा, गुजरात के मेहसाणा का सूर्य मंदिर। तीसरा, राजस्थान का झालरापाटन एवं चौथा अनंतनाग का अदभुत सूर्य मंदिर। 7वीं—8वीं में निर्मित अनंतनाग का सूर्य मंदिर कश्मीर में हिन्दू अस्मिता के प्रतीकों में से एक था। कश्मीर के प्रतापी राजा ललितादित्य द्वारा बनवाया गया यह मंदिर सनातन धर्म के स्वर का नाद घाटी में करता था।
कश्मीर में रहने के लिए मजहबी उन्माद में पागल बुतशिकन सिकंदर जैनुल आबिदीन ने सरकारी आदेश जारी कर हिन्दुओं के सामने तीन तथाकथित शर्त रखीं थी- पहली, इस्लाम स्वीकार कर लो। दूसरी, कश्मीर छोड़कर भाग जाओ। तीसरी, दोनों शर्त नामंजूर हैं तो बर्बरतापूर्ण मौत के लिए तैयार रहो। देश के सेकुलर जमात के इतिहासकार इसी जैनुल आबिदीन को कश्मीर का अकबर कहकर उसकी गौरव गाथा कहते नहीं अघाते।
बहरहाल तीनों ही शर्तें हिन्दुओं को अस्वीकार थीं। न ही वे तलवार की दम पर इस्लाम स्वीकार करने के लिए तैयार थे और न ही कश्मीर को छोड़कर जाने के लिए। यानी ऋषि कश्यप के पुत्रों ने मौत से लड़ने की ठान ही ली, जो उसकी तीसरी शर्त थी। कश्मीर पूरी तरह से शरीयत के कानून से जकड़ चुका था। इस्लाम के नाम पर नंगा—नाच खुलेआम खेला जा रहा था। यह वह समय था जब कश्मीर क्षेत्र में (There was no city, no town, no forest , where the Turushka left the Temples of gods unbroken) कोई भी पुरवा, गांव, कस्बा व वन क्षेत्र नहीं बचा जहां देवी—देवताओं के मंदिरों का ध्वंश न किया गया हो। हजारों—हजार मंदिर तोड़े गए। मंदिर में स्थापित देव प्रतिमाओं के अनादर से लेकर उन्हें दरिया में फेंकने, जलाने, रौंदने, तोड़ने का यह अमानुशिक क्रम जारी था। भारतीयता का गौरव गान करने वाली धरती मतांध सिकंदर के अत्याचार से कराह रही थी।
दूसरी तरफ कश्मीर में तलवार और सलवार की दम पर इस्लाम का विस्तार किया जा रहा था। इन अमानवीय जुल्मों के आगे निरीह हिन्दू या तो इस्लाम में कन्वर्ट हो रहे थे या इस्लाम के शांति दूतों की तलवार का शिकार हो रहे थे। बहुतों ने डर से कश्मीर छोड़ दिया तो अनेक हिन्दू परिवारों ने अपनी अस्मिता और धर्म की रक्षा हेतु प्राण त्यागना ही ठीक समझा। पूरी तरह से सिंकदर ने कश्मीर पर अपना अधिपत्य जमा लिया था।
इसी बीच 1393 में सैययद मुहम्मद हमदानी सैकड़ों इस्लामिक मतांध साथियों के साथ कश्मीर आ धमका। सिंकदर ने उसके पहुंचने पर राजकीय सम्मान के साथ जोरदार स्वागत किया और उनके रहने के लिए तीन जागीरें दीं। सुख—सुविधा से संपन्न इस गिरोह का सिर्फ एक ही काम था कश्मीर को इस्लाम के झंडे तले ले आना। सो इस झुंड ने साम, दाम, दंड और भेद का सहारा लेते हुए घाटी में इस्लामिक गतिविधियां तेज कर दीं। इसके लिए शासन का पूरा सहयोग उनको प्राप्त था।
बचे—खुचे हिन्दुओं को जीने के अधिकार पर जजिया टैक्स देने का हुक्म दिया गया। हिन्दू पर्वों आयोजनों पर बंदिशें लग गईं। शिवरात्रि, नवदुर्गा,दीपावली, रामनवमी एवं अन्य कर्मकांडों एवं पारिवारिक कार्यक्रमों तक पर बलात कर लिया जाने लगा। अगर कोई हिन्दू परिवार तीर्थ यात्रा करता तो उससे भी क्रूर कर लिया जाता था।
लेकिन इस्लामिक जिहादियों के अत्याचार का यह अंत नहीं था। तलवार के दम पर वे जब भी चाहते थे किसी भी हिन्दू के घर में घुस जाते थे और सारी दौलत लूटकर आपस में बांट लेते थे। इसे किसी तरह हिन्दू सहन कर लेते थे लेकिन जो सबसे असहनीय था हिन्दू लड़कियों, महिलाओं पर जुल्म ढहाना। माल—ए—गनीमत के तहत ये नरभक्षी मुसलमान हिन्दू महिलाओं को अपना शिकार बनाते, उनका बलात्कार करते और उन्हें लूटी ही वस्तु की तरह इस्तेमाल करते। बलात्कार की शिकार हुईं हिन्दू नारियों की चीखें घाटी को रुला रहीं थीं। यानी अत्याचार चरम पर था। रक्त पिपाशु और शरीर के भूखे भेड़िये इस्लाम के नाम पर कश्मीर को हरे झंडे में लाने के लिए सब कर रहे थे।
यह सब अत्याचारी सिकंदर के इशारों पर ही किया जा रहा था। वह कहता था कि कश्मीर को अगर कभी कोई खतरा होगा तो हिन्दुओं से ही होगा। इसलिए उनका कोई भी चिन्ह यहां न बचे, जिससे भविष्य में हिन्दुओं द्वारा कोई खतरा पैदा हो। इसलिए वह हिन्दुओं को समाप्त करने, कन्वर्ट करने, महिलाओं पर अत्याचार ढहाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा था। इसे वह खुदा का हुक्म मानता था।
इस्लाम की वकालत करने वालों को आज यह बताना चाहिए यह कौन खुदा है जो दूसरों पर अत्याचार ढहाने, उनका रक्त बहाने, उन्हें कन्वर्ट करने, हिन्दू महिलाओं की बलात इज्जत लूटने और बलात्कार करने का हुक्म देता है ? क्या यही इस्लाम का असली चेहरा है?
कश्मीर शुरुआत से अपनी संस्कृति, परंपरा और मंदिरों के लिए विख्यात रहा। यहां के मंदिर किसी भी आश्चर्य से कम नहीं थे। अदृभुत स्थापत्य कला से विभूषित यह मंदिर किसी को भी अपनी ओर आकर्षित किए बिना नहीं रहने देते। लेकिन सिकंदर और उसके जिहादियों ने इन मंदिरों को मिटृटी में मिला दिया, तोड़ दिया, जला दिया।
इन मंदिरों का कोई चिन्ह न रहने पाए इसके लिए उसने मंदिर के स्थान पर बड़ी—बड़ी मस्जिदें बनवानी शुरू कीं। खानकाहें भी बनवाईं। जो काम सिकंदर ने उस समय किया देश आजाद होने के बाद कश्मीर के मुस्लिमों शासकों—अब्दुल्ला—मुफती परिवार ने उसमें चार चांद ही लगाए और हिन्दू अस्मिता के प्रतीकों को मिटाने, धूलधूसरित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
अब बारी थी मार्तंड मंदिर की…
देश में मुख्य रूप से चार सूर्य मंदिर हैं। पहला, ओडिशा स्थित कोणार्क। दूसरा, गुजरात के मेहसाणा का सूर्य मंदिर। तीसरा, राजस्थान का झालरापाटन एवं चौथा अन्ंतनाग का अदभुत सूर्य मंदिर। 7वीं—8वीं में निर्मित अन्ंतनाग का सूर्य मंदिर कश्मीर में हिन्दू अस्मिता के प्रतीकों में से एक था। कश्मीर के प्रतापी राजा ललितादित्य द्वारा बनवाया गया यह मंदिर सनातन धर्म के स्वर का नाद घाटी में करता था। चारों ओर हिमाच्छादित पहाड़ों से घिरा सूर्य भगवान को समर्पित मंदिर देश—दुनिया के लिए आकर्षण का केंद्र हुआ करता था।
मार्तंड सूर्य मंदिर का निर्माण मध्यकालीन युग में 7वीं से 8वीं शताब्दी के दौरान हुआ था जो हिंदू सूर्य भगवान को समर्पित है। सूर्य राजवंश के राजा ललितादित्य ने इस मंदिर का निर्माण एक छोटे से शहर अनंतनाग के पास एक पठार के ऊपर किया था। इसकी गणना ललितादित्य के प्रमुख कार्यों में की जाती है। इसमें 84 स्तंभ हैं जो नियमित अंतराल पर रखे गए हैं।
इस मंदिर को बनाने के लिए चूने के पत्थर की चौकोर ईंटों का उपयोग किया गया है जो उस समय के कलाकारों की कुशलता को दर्शाता है। इस मंदिर की राजसी वास्तुकला इसे अलग बनाती है। बर्फ से ढंके हुए पहाड़ों की पृष्ठभूमि के साथ केंद्र में यह मंदिर इस स्थान का करिश्मा ही कहा जाएगा। इस मंदिर से कश्मीर घाटी का मनोरम दृश्य भी देखा जा सकता है।
लेकिन सिकंदर की कुदृष्टि इस पर पड़ ही गई। मंदिर को ध्वंश किया जाने लगा। यह क्रम एक वर्ष तक चला। लेकिन जिहादी सिकंदर इतने पर भी नहीं रुका। कला, संस्कृति और हिन्दू अस्मिता के प्रतीकों के दुश्मन ने मंदिर को लकड़ियों से भरकर जलाया। धू—धू कर यह मंदिर जलता रहा। मंदिर की दीवारों पर तराशी गई स्वर्णयुक्त कलाकृतियां नष्ट हो गईं। मंदिर का अलौकिक स्वर्ण जड़ित गुम्बद बर्बाद होते देख सिकंदर खूब हंसता रहा और तबाही करवाता रहा।
मंदिर को बचाने जो भी आया उसकी बर्बर हत्या की, मंदिर के निकट हिन्दुओं के गांवों को इस्लाम में कन्वर्ट होने का आदेश तामील कर दिया गया। और जिन्होंने इस आदेश का विरोध किया उनके सिर धड़ से अलग कर दिये गए। यह थी इस्लाम की खूबसूरती। गंगा—जमुनी तहजीब का सच…
आज भी इस विश्व प्रसिद्ध मंदिर के भग्नावशेषों को देखा जा सकता है। वह चीख—चीखकर अपने उपर हुए जुल्मों को बताते हैं। मौजूदा समय में मंदिर मुस्लिम लड़के—लड़कियों के लिए पिकनिक स्पॉट बन चुका है, जहां वे मौज—मस्ती करते हैं। जमीन पर औंधे मुंह पड़ी मूर्तिर्यों को इस्लामिक जिहादी आज भी अपने पैरों तले कुचलते हुए हिन्दू—मुस्लिम भाई—भाई का संदेश देते हैं। 85 करोड़ हिंदुओं के देश का यही सच है।
इस सबके बावजूद सेकुलर हिन्दू यह कहते नहीं थकते-ईश्वर अल्लाह तेरो नाम!!!शायद क्रूर सिकन्दर के लिए ईश्वर और अल्लाह दो थे. उसके लिए उसका अल्लाह ही सब कुछ था. इस उद्धरण से उनको सीख मिलनी चाहिए जो कहते हैं-सबका मालिक एक है.अगर भगवान एक ही है तो मूर्तिभंजक सिकन्दर से लेकर मुगल आक्रांता बाबर, औरंगजेब, बिन कासिम ने सूर्य मंदिर , अयोध्या में राम लला का मंदिर, गुजरात के सोमनाथ सहित सैकड़ों-लाखों मन्दिर क्यों ध्वंश किये ??? है इसका कोई जवाब ???
फिर भी सेकुलरों के लिए इस्लाम महान। शांति का मजहब है। भाई चारे का संदेश देता है। सूफी धारा ने ही कश्मीर को बचाकर रखा हुआ है, नहीं तो हिन्दुओं का तो नामोनिशान मिट जाता, आदि आदि… बातें कहकर भोलेभाले हिंदुओं को आज भी भ्रमित किया जा रहा है।
आखिर ली ही गई कश्मीर के मंदिरों की सुध…
जब केंद्रीय गृह राज्यमंत्री जी किशन रेडृडी कश्मीर में 50 हजार मंदिरों की बात करते हैं तो हिन्दू समाज हक्का—बक्का रह जाता है तो वहीं कई सेकुलर व्यंग भरे लहजे में सवाल करते हैं कि घाटी में इतने मंदिर ? शायद उन्होंने इतिहास नहीं पढ़ा। Al Masudi ( 944 AD) स्वीकार करते हैं,” कश्मीर में 70000 छोटे—छोटे गांव थे।” समयानुसार सीमाओं का बढ़ना—घटना होता रहा। इससे एक बात साबित होती है कि इन गांवों में हिन्दू रहते ही थे तो उनके मंदिर भी थे। दूसरी बात हिन्दू समाज प्रकृति पूजक है। पेड़—पौधे भी उसके लिए देवता हैं। और उसके लिए हर वह चीज पूजनीय और मठ—मंदिर के समान हैं जो मानव कल्याण की कामना रखती है। लेकिन समय—समय पर कटृटरपंथियों ने हिन्दू अस्मिता के प्रत्येक चिन्ह को नष्ट किया, जमींदोज किया। उनके स्थान पर बलात श्रीनगर स्थित विलवेहात मस्जिद, जामा मस्जिद, हाजी पीर मोहम्मद की जियारत, मजार मलिक साहिब, विजेश्वर खनक, जैसी अनेक मस्जिदों का निर्माण कराया।